Thursday, 19 February 2026

40 Day Fasting Prayer – Day 2 | पश्चाताप और आत्मशुद्धि | 1 यूहन्ना 1:9 की गहरी व्याख्या

🔥 सप्ताह 1 – पश्चाताप और आत्मशुद्धि

🔥 40 दिन उपवास – Day 2

📖 1 यूहन्ना 1:9

“यदि हम अपने पापों को मान लें, तो वह हमारे पापों को क्षमा करने, और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में विश्वासयोग्य और धर्मी है।”

🌿 प्रस्तावना

40 दिन के उपवास का दूसरा दिन हमें एक गहरी सच्चाई की ओर ले जाता है – पश्चाताप। उपवास केवल शरीर को अनुशासन में लाने का माध्यम नहीं है, बल्कि आत्मा को परमेश्वर के सामने झुकाने का समय है। Day 2 हमें याद दिलाता है कि आत्मिक जागृति की शुरुआत स्वीकारोक्ति से होती है।

जब तक मन पाप को छिपाता है, तब तक आत्मा बोझिल रहती है। लेकिन जब मन खुलता है, जब हृदय स्वीकार करता है, तब परमेश्वर की कृपा बहने लगती है। इस पद में शर्त भी है और प्रतिज्ञा भी। यदि हम मान लें — तो वह क्षमा करेगा।


1️⃣ “यदि हम अपने पापों को मान लें”

यहाँ “यदि” शब्द बहुत महत्वपूर्ण है। परमेश्वर हमें मजबूर नहीं करता, वह आमंत्रित करता है। वह पूर्णता नहीं, सच्चाई चाहता है।

पाप को मान लेने का अर्थ केवल शब्दों में स्वीकार करना नहीं है। इसका अर्थ है —

  • • अपनी गलती को पहचानना
  • • बहाना न बनाना
  • • दोष किसी और पर न डालना
  • • टूटे और नम्र मन से प्रभु के सामने झुकना
  • • अपने व्यवहार और सोच को बदलने का निर्णय लेना

अक्सर हम कहते हैं — “सब ऐसा ही करते हैं”, “परिस्थिति ऐसी थी”, “मेरी मजबूरी थी।” लेकिन सच्चा पश्चाताप बहानों को खत्म कर देता है। जहाँ स्वीकारोक्ति है, वहीं से आत्मिक चंगाई शुरू होती है।

जब हम प्रकाश में आते हैं, तब अंधकार की शक्ति टूट जाती है। छिपा हुआ पाप हमें अंदर से कमजोर करता है, परन्तु स्वीकार किया हुआ पाप हमें परमेश्वर के अनुग्रह से जोड़ देता है।


2️⃣ “वह हमारे पापों को क्षमा करने में विश्वासयोग्य है”

यहाँ परमेश्वर के स्वभाव का वर्णन है। वह विश्वासयोग्य है — अर्थात वह बदलता नहीं। उसकी दया परिस्थिति पर निर्भर नहीं करती।

हमारी भावनाएँ बदल सकती हैं। हम कभी विश्वास से भरे होते हैं, कभी निराश। लेकिन परमेश्वर की विश्वासयोग्यता स्थिर रहती है।

उसकी क्षमा हमारे योग्य होने पर आधारित नहीं है, बल्कि उसकी प्रतिज्ञा पर आधारित है। उसने कहा है — यदि तुम मान लोगे, तो मैं क्षमा करूँगा।

कितना अद्भुत है कि स्वर्ग का परमेश्वर हमारी स्वीकारोक्ति की प्रतीक्षा करता है ताकि वह हमें क्षमा कर सके।


3️⃣ “और हमें सब अधर्म से शुद्ध करने में धर्मी है”

क्षमा केवल पाप हटाना नहीं है। शुद्ध करना एक गहरी प्रक्रिया है। यह भीतर की जड़ों को बदलना है।

परमेश्वर केवल दोष मिटाता नहीं, वह चरित्र को भी नया करता है। वह केवल गंदगी हटाता नहीं, वह नया हृदय देता है।

जब हम स्वीकार करते हैं, तो वह हमें केवल माफ नहीं करता, बल्कि हमें नया बनाने का कार्य शुरू करता है।

Day 2 हमें सिखाता है कि उपवास केवल भोजन छोड़ना नहीं, बल्कि पाप छोड़ना है।


📖 वचन – भजन 32:5

“मैं ने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया, और अपना अधर्म न छिपाया; मैं ने कहा, मैं यहोवा के सम्मुख अपने अपराधों को मान लूंगा, और तू ने मेरे पाप का दोष क्षमा किया।”

वचन की विस्तार से व्याख्या

यहाँ दाऊद अपने व्यक्तिगत अनुभव से गवाही देता है। वह बताता है कि जब तक उसने पाप छिपाया, तब तक उसके भीतर भारीपन था।

🌿 “मैं ने अपना पाप तुझ पर प्रगट किया”

प्रकट करना साहस मांगता है। परमेश्वर से कुछ छिपा नहीं है, फिर भी वह चाहता है कि हम स्वयं स्वीकार करें।

जैसे ही दाऊद ने पाप को प्रकट किया, उसी क्षण से उसकी आत्मा में हल्कापन आने लगा।

🌿 “अपना अधर्म न छिपाया”

छिपाना आत्मा को बोझिल करता है। गुप्त अपराध मन में भय और शर्म पैदा करते हैं। लेकिन स्वीकार करना स्वतंत्रता लाता है।

🌿 “तू ने मेरे पाप का दोष क्षमा किया”

यह तुरंत होने वाला अनुग्रह है। परमेश्वर देरी नहीं करता जब मन सच्चा होता है। जहाँ सच्चाई है, वहाँ तुरंत कृपा बहती है।


🔥 Day 2 का आत्मिक संदेश

दूसरा दिन हमें याद दिलाता है कि पश्चाताप कमजोरी नहीं, शक्ति है। जो व्यक्ति स्वीकार करता है, वही बढ़ता है।

उपवास का यह दिन हमें बुलाता है —

  • • अपने हृदय की जाँच करें
  • • अपने शब्दों की समीक्षा करें
  • • अपने व्यवहार को परखें
  • • छिपे हुए पापों को प्रभु के सामने रखें

जब स्वीकारोक्ति होती है, तब बहाली होती है। जब नम्रता आती है, तब अनुग्रह उतरता है।


🙏 आज की प्रार्थना

हे प्रभु, आज 40 दिन के उपवास के दूसरे दिन मैं तेरे सामने नम्र होकर आता हूँ।

मेरे जीवन में जो भी छिपी हुई बातें हैं, उन्हें उजागर कर। मुझे साहस दे कि मैं अपने पापों को मान सकूँ।

मेरे भीतर सच्चा पश्चाताप उत्पन्न कर। मुझे केवल शब्दों से नहीं, बल्कि हृदय से बदल दे।

तेरी विश्वासयोग्यता पर मैं भरोसा करता हूँ। जैसा तूने वचन दिया है, मुझे क्षमा कर और शुद्ध कर।

इस उपवास को केवल धार्मिक परंपरा न रहने दे, इसे आत्मिक बहाली की यात्रा बना दे।

आमीन।


🌈 निष्कर्ष

Day 2 हमें सिखाता है — स्वीकारोक्ति से शुद्धि आती है, और शुद्धि से नई शुरुआत होती है।

जब हम पाप मान लेते हैं, तो परमेश्वर क्षमा करता है। जब वह क्षमा करता है, तो आत्मा स्वतंत्र हो जाती है।

यह 40 दिन की यात्रा केवल उपवास नहीं, बल्कि परिवर्तन की प्रक्रिया है। आज स्वीकारोक्ति करो, कल बहाली देखोगे।

Monday, 16 February 2026

40 दिन उपवास Day 1 | शुद्ध मन की प्रार्थना | 40 Days Fasting Prayer Hindi

🔥 40 दिन उपवास – Day 1

✨ शुद्ध मन और स्थिर आत्मा की प्रार्थना


📖 भजन संहिता 51:10

“हे परमेश्वर, मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर, और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर।”


✨ व्याख्या

यह वचन दाऊद की गहरी पश्चाताप की प्रार्थना है। जब दाऊद अपने पाप को पहचान चुका था तब उसने प्रभु के सामने यह प्रार्थना की।

दाऊद ने प्रभु से कोई बाहरी आशीष नहीं मांगी। उसने धन, राज्य या सामर्थ्य नहीं चाहा। उसने केवल अपने भीतर के मनुष्य के बदलने की याचना की।

यह हमें सिखाता है कि प्रभु सबसे पहले हमारे हृदय को देखता है। यदि हृदय शुद्ध हो जाए तो जीवन अपने आप बदल जाता है।


🌿 “शुद्ध मन” का अर्थ

शुद्ध मन का अर्थ केवल पाप से दूर रहना नहीं है। शुद्ध मन का अर्थ है ऐसा हृदय जो छल से मुक्त हो। ऐसा मन जिसमें कड़वाहट न हो। ऐसी सोच जिसमें ईर्ष्या और घमंड न हो।

उपवास का पहला दिन हमें यह सिखाता है कि सच्चा उपवास केवल भोजन का नहीं होता बल्कि गलत सोच का भी होता है।

यदि पेट खाली हो और मन गंदा रहे तो उपवास का उद्देश्य पूरा नहीं होता।


🔥 “स्थिर आत्मा” का अर्थ

स्थिर आत्मा का अर्थ है ऐसा विश्वास जो परिस्थितियों से न डगमगाए। ऐसा मन जो दुख में भी प्रभु पर भरोसा रखे।

कई बार हम आशीष में प्रभु को धन्यवाद देते हैं लेकिन संकट आते ही हमारा विश्वास हिल जाता है।

दाऊद जानता था कि यदि आत्मा स्थिर हो जाए तो जीवन के तूफान भी हमें गिरा नहीं सकते।


📖 अन्य सहायक वचन

मत्ती 5:8

“धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे।”

यहेजकेल 36:26

“मैं तुम को नया मन दूंगा और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा।”

2 कुरिन्थियों 5:17

“यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है।”


🌸 40 दिन उपवास – Day 1 का आत्मिक संदेश

40 दिन के उपवास की शुरुआत हृदय की सफाई से होती है। पहला दिन पूरे उपवास की दिशा तय करता है।

यदि शुरुआत शुद्ध मन से होगी तो आने वाले दिन सामर्थ्य से भर जाएंगे।

आज प्रभु हमें बुला रहे हैं अपने हृदय को उसके सामने खोलने के लिए।


🙏 आज की प्रार्थना

हे प्रभु आज इस 40 दिन के उपवास के पहले दिन मैं अपने आप को तेरे सामने समर्पित करता हूं।

मेरे भीतर जो भी अशुद्धता है उसे दूर कर।

मेरे मन को शुद्ध कर मेरी आत्मा को स्थिर कर।

मुझे ऐसा विश्वास दे जो परिस्थितियों से बड़ा हो।

इस 40 दिन की यात्रा को मेरे जीवन परिवर्तन की यात्रा बना दे।

आमीन।


🌈 निष्कर्ष

40 दिन उपवास Day 1 हमें यह सिखाता है कि सच्चा परिवर्तन भीतर से शुरू होता है।

जब मन शुद्ध होगा तो जीवन में शांति आएगी।

जब आत्मा स्थिर होगी तो प्रभु की उपस्थिति जीवन में बनी रहेगी।

आज से शुरुआत करें शुद्ध मन और स्थिर आत्मा के साथ।

🔥 40 दिन उपवास – Day 1

✨ मन की शुद्धि और नई आत्मा की शुरुआत


🌿 प्रस्तावना

40 दिन का उपवास केवल भोजन छोड़ने का नाम नहीं है

यह आत्मा की यात्रा है

यह भीतर की सफाई है

यह प्रभु के सामने स्वयं को झुकाने का समय है

जब हम इस 40 दिन की यात्रा की शुरुआत करते हैं तो सबसे पहला कार्य है

अपने हृदय को प्रभु के सामने खोल देना

आज का दिन मन की शुद्धि का दिन है

आज का दिन आत्मिक नवीनीकरण का दिन है


📖 भजन संहिता 51:10

“हे परमेश्वर मेरे अन्दर शुद्ध मन उत्पन्न कर और मेरे भीतर स्थिर आत्मा नये सिरे से उत्पन्न कर”


✨ व्याख्या – गहराई से समझें

यह प्रार्थना दाऊद की है

जब वह अपने पाप को पहचान चुका था

जब उसे समझ आया कि बाहरी सफलता भीतर की पवित्रता से बड़ी नहीं है

दाऊद ने धन नहीं मांगा

राज्य नहीं मांगा

शत्रुओं पर विजय नहीं मांगी

उसने मांगा – शुद्ध मन

🌿 1. शुद्ध मन क्या है

शुद्ध मन का अर्थ है

ऐसा हृदय जो छल से मुक्त हो

ऐसा मन जो ईर्ष्या से खाली हो

ऐसी सोच जिसमें कड़वाहट न हो

उपवास हमें भोजन से दूर करता है

लेकिन उसका उद्देश्य हमें पाप से दूर करना है

यदि पेट खाली हो जाए पर मन गंदा रहे

तो उपवास अधूरा है

आज प्रभु हमें बुला रहे हैं

पहले मन की सफाई करो

🔥 2. स्थिर आत्मा क्या है

स्थिर आत्मा का अर्थ है

ऐसा विश्वास जो परिस्थिति देखकर बदल न जाए

ऐसी आत्मा जो समस्या में भी प्रभु पर भरोसा रखे

कभी हम आशीष में खुश रहते हैं

और संकट में टूट जाते हैं

दाऊद जानता था

अगर आत्मा स्थिर हो जाए

तो तूफान भी जीवन को नहीं गिरा सकता

40 दिन की इस यात्रा में

हमें भावनात्मक नहीं

आत्मिक रूप से मजबूत बनना है


📖 अतिरिक्त वचन – हृदय की शुद्धि पर

📖 मत्ती 5:8

“धन्य हैं वे जिनके मन शुद्ध हैं क्योंकि वे परमेश्वर को देखेंगे”

शुद्ध मन वाला व्यक्ति ही प्रभु की उपस्थिति को अनुभव करता है

📖 यहेजकेल 36:26

“मैं तुम को नया मन दूंगा और तुम्हारे भीतर नई आत्मा उत्पन्न करूंगा”

प्रभु केवल सुधार नहीं करते

वह नया आरंभ देते हैं

📖 2 कुरिन्थियों 5:17

“यदि कोई मसीह में है तो वह नई सृष्टि है पुरानी बातें बीत गई हैं देखो वे सब नई हो गई हैं”

उपवास का पहला दिन नई शुरुआत का दिन है


🌺 क्यों जरूरी है पहले दिन हृदय की सफाई

क्योंकि बिना शुद्ध आधार के

आत्मिक भवन नहीं बन सकता

यदि जड़ें स्वस्थ होंगी

तो वृक्ष फल देगा

यदि मन पवित्र होगा

तो जीवन में शांति होगी

आज का दिन केवल शुरुआत नहीं

पूरे 40 दिन की दिशा तय करता है


🙏 आज की प्रार्थना

हे प्रभु

आज इस 40 दिन की यात्रा के पहले दिन
मैं अपने आप को तेरे सामने झुकाता हूं

मेरे भीतर जो भी अशुद्धता है
उसे दूर कर

मेरे मन से क्रोध निकाल दे
मेरे हृदय से ईर्ष्या निकाल दे
मेरी सोच से नकारात्मकता हटा दे

मुझे नया मन दे
मुझे स्थिर आत्मा दे

ऐसा विश्वास दे जो परिस्थितियों से बड़ा हो
ऐसा हृदय दे जो तेरे लिए धड़कता हो

प्रभु
इस 40 दिन के उपवास को केवल एक धार्मिक कार्य न रहने दे
इसे जीवन परिवर्तन की यात्रा बना दे

आमीन


🌈 40 दिन की यात्रा का संकल्प

आज मैं संकल्प लेता हूं

मैं केवल भोजन का उपवास नहीं करूंगा

मैं गलत सोच का भी उपवास करूंगा

मैं केवल शब्दों में नहीं

हृदय में परिवर्तन लाऊंगा

मैं हर दिन प्रभु के और निकट आऊंगा


✨ निष्कर्ष

40 दिन का उपवास Day 1 हमें सिखाता है

सच्चा परिवर्तन भीतर से शुरू होता है

जब मन शुद्ध होगा

तो जीवन स्वतः बदल जाएगा

जब आत्मा स्थिर होगी

तो तूफान भी हमें नहीं गिरा पाएंगे

आज शुरुआत है

कल आशीष होगी

और आने वाले 40 दिन जीवन को नई दिशा देंगे

Saturday, 14 February 2026

असंभव को संभव करने वाला परमेश्वर

यहोशू 4:23 क्योंकि जैसे तुम्हारे परमेश्वर यहोवा ने लाल समुद्र को हमारे पार हो जाने तक हमारे साम्हने से हटाकर सुखा रखा था, वैसे ही उसने यरदन का भी जल तुम्हारे पार हो जाने तक तुम्हारे साम्हने से हटाकर सुखा रखा।” *परमेश्वर की निरंतर सामर्थ* यह वचन बताता है कि परमेश्वर की सामर्थ समय के साथ कम नहीं होती। जिस परमेश्वर ने मूसा के समय लाल समुद्र को सुखाया उसी ने यहोशू के समय यरदन नदी को भी रोक दिया। परिस्थितियाँ बदल सकती हैं नेता बदल सकते हैं लेकिन परमेश्वर की शक्ति नहीं बदलती। *असंभव को संभव करने वाला परमेश्वर* लाल समुद्र और यरदन नदी दोनों ही मानव दृष्टि से असंभव बाधाएँ थीं। पीछे मिस्र की सेना और आगे गहरा समुद्र फिर आगे तेज बहती यरदन नदी परमेश्वर ने दोनों बार रास्ता बनाया। यह सिखाता है कि जब हम अपने जीवन में “समुद्र” या “नदी” जैसी समस्या देखते हैं तो हमें डरने की नहीं *विश्वास करने की आवश्यकता है।* जब तक तुम पार न हो जाओ वचन में एक महत्वपूर्ण बात है “हमारे पार हो जाने तक” परमेश्वर ने केवल रास्ता खोला ही नहीं बल्कि तब तक खुला रखा जब तक सब लोग सुरक्षित पार नहीं हो गए। यह दर्शाता है कि परमेश्वर अधूरा काम नहीं करता। वह आधे रास्ते में हमें छोड़ नहीं देता। वह तब तक साथ रहता है जब तक हम पूरी तरह सुरक्षित स्थान पर न पहुँच जाएँ। *पुरानी गवाही नई पीढ़ी के लिए* इस वचन का उद्देश्य था कि नई पीढ़ी जाने कि जिस परमेश्वर ने उनके पूर्वजों को बचाया वही परमेश्वर आज भी कार्य कर रहा है। हमारे जीवन में भी पुरानी गवाहियाँ आज के विश्वास को मजबूत करती हैं। *देखें* लाल समुद्र मिस्र की दासता से छुटकारे का प्रतीक है। यरदन नदी प्रतिज्ञा किए हुए देश में प्रवेश का प्रतीक है। इसका अर्थ है परमेश्वर न केवल हमें पाप और बंधन से छुड़ाता है बल्कि हमें आशीष और प्रतिज्ञा की भूमि में भी पहुँचाता है। जीवन में लागू करना अगर आज आपके सामने कोई “समुद्र” खड़ा है या कोई “यरदन” रास्ता रोक रहा है तो याद रखिए जिस परमेश्वर ने पहले रास्ता बनाया वही आज भी बना सकता है। वह तब तक रास्ता खुला रखेगा जब तक आप पूरी तरह पार न हो जाएँ। ✍️ *Pastor Emmanuel* *NEW life Sikhte Hai Kuch*

Wednesday, 21 January 2026

परमेश्वर आत्मा है – आत्मा और सच्चाई से भजन करें | Powerful Christian Message in Hindi

आत्मा और सच्चाई से भजन करने वाले

📖 मुख्य वचन
“परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करने वाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें।”
(यूहन्ना 4:24)


🔹 1. परमेश्वर आत्मा है – उसकी पहचान और स्वभाव

व्याख्या:
यह वचन हमें परमेश्वर के स्वभाव को स्पष्ट रूप से समझाता है। परमेश्वर आत्मा है, अर्थात वह भौतिक सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है। वह हर स्थान पर उपस्थित रहने वाला, सब कुछ जानने वाला और हर समय कार्य करने वाला प्रभु है। वह मनुष्य की बाहरी दशा को नहीं, बल्कि उसके भीतरी मन और आत्मा की स्थिति को देखता है।

जब हम यह समझते हैं कि परमेश्वर आत्मा है, तब हमारी आराधना का दृष्टिकोण बदल जाता है। तब हम केवल औपचारिकता या रीति से नहीं, बल्कि पूरे हृदय से परमेश्वर के सामने झुकते हैं। ऐसा भजन केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली हुई आराधना होती है।

📖 2 कुरिन्थियों 3:17
“प्रभु आत्मा है; और जहाँ प्रभु का आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है।”

📖 भजन संहिता 34:18
“यहोवा टूटे हुए मन वालों के निकट रहता है, और पिसे हुए मन वालों का उद्धार करता है।”


🔹 2. भजन का अर्थ – सम्पूर्ण जीवन का समर्पण

व्याख्या:
भजन केवल गीत गाने या शब्द बोलने तक सीमित नहीं है। बाइबल के अनुसार भजन का अर्थ है अपने पूरे जीवन को परमेश्वर के अधीन कर देना। जब मनुष्य अपने विचार, इच्छाएँ, योजनाएँ और मार्ग परमेश्वर को सौंप देता है, तब उसका जीवन स्वयं एक भजन बन जाता है।

परमेश्वर ऐसे भजन को स्वीकार करता है जो आज्ञाकारिता और नम्रता से भरा हो। यदि मनुष्य अपने जीवन में परमेश्वर की इच्छा को मानने से इनकार करता है, तो केवल शब्दों का भजन परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करता।

📖 भजन संहिता 95:6
“आओ, हम झुककर दण्डवत करें; अपने कर्ता यहोवा के सम्मुख घुटने टेकें।”

📖 रोमियों 12:1
“अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भाता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ; यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।”

📖 1 शमूएल 15:22
“आज्ञा मानना बलिदान से और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से कहीं अच्छा है।”


🔹 3. आत्मा से भजन करना – जीवित और सामर्थी आराधना

व्याख्या:
आत्मा से भजन करने का अर्थ है ऐसा भजन जो केवल बुद्धि या भावना तक सीमित न रहे, बल्कि परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में हो। जब मनुष्य आत्मा से भजन करता है, तब वह परमेश्वर के साथ गहरे संबंध में प्रवेश करता है।

ऐसा भजन बोझ नहीं लगता, बल्कि आत्मा को ताज़गी और शांति देता है। आत्मा से किया गया भजन मनुष्य के जीवन को बदलता है, उसे सामर्थ देता है और विश्वास में स्थिर करता है।

📖 रोमियों 8:26
“इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है।”

📖 इफिसियों 5:18-19
“आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ; और भजन, स्तुति और आत्मिक गीत गाया करो।”

📖 गलातियों 5:25
“यदि हम आत्मा से जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी।”


🔹 4. सच्चाई से भजन करना – वचन के अनुसार जीवन

व्याख्या:
सच्चाई से भजन करने का अर्थ है ऐसा जीवन जीना जो परमेश्वर के वचन के अनुसार हो। यदि हमारा जीवन वचन से अलग है और हमारा भजन अलग, तो वह भजन अधूरा रह जाता है। सच्चाई से भजन तब होता है जब हमारा आचरण, सोच और निर्णय परमेश्वर के वचन के अधीन होते हैं।

परमेश्वर का वचन सत्य है और वही मनुष्य के जीवन को पवित्र करता है। जब कोई व्यक्ति वचन में स्थिर रहता है, तब उसका भजन भी सच्चा और स्वीकार्य बनता है।

📖 यूहन्ना 17:17
“सच्चाई से उन्हें पवित्र कर; तेरा वचन सत्य है।”

📖 भजन संहिता 119:105
“तेरा वचन मेरे पांव के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए उजियाला है।”

📖 भजन संहिता 119:160
“तेरे वचन का सार सत्य है।”


🔹 5. परमेश्वर की खोज – सच्चे भजन करने वालों के लिए

व्याख्या:
बाइबल यह स्पष्ट करती है कि परमेश्वर स्वयं ऐसे लोगों को खोजता है जो आत्मा और सच्चाई से भजन करें। वह केवल बाहरी भीड़ से प्रसन्न नहीं होता, बल्कि उन हृदयों को ढूंढ़ता है जो पूरी रीति से उसके प्रति समर्पित हों।

यह एक अद्भुत सच्चाई है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य के हृदय की खोज करता है, ताकि वह उसे सामर्थ और आशीष दे सके।

📖 यूहन्ना 4:23
“पिता ऐसे भजन करने वालों को ढूंढ़ता है जो आत्मा और सच्चाई से भजन करें।”

📖 2 इतिहास 16:9
“यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर लगी रहती है कि जिनका मन उसकी ओर पूरा है, उन्हें वह सामर्थ दे।”


🔹 6. आज के समय के लिए आत्मिक सीख

व्याख्या:
आज के समय में यह वचन हमें आत्मिक जांच करने के लिए बुलाता है। क्या हमारा भजन केवल परंपरा बन गया है, या वह वास्तव में आत्मा और सच्चाई से निकल रहा है? परमेश्वर आज भी ऐसे भजन से प्रसन्न होता है जो टूटे और नम्र हृदय से किया गया हो।

📖 भजन संहिता 51:17
“टूटा हुआ और पिसा हुआ मन—ऐसा बलिदान परमेश्वर तुच्छ नहीं जानता।”

📖 यशायाह 29:13
“ये लोग मुँह से मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है।”


🙏 समापन विचार

परमेश्वर आत्मा है।
वह हमारे शब्दों से अधिक हमारे हृदय को देखता है।
जब हम आत्मा और सच्चाई से भजन करते हैं,
तब हमारा भजन केवल सुनाई नहीं देता,
बल्कि परमेश्वर के सिंहासन तक पहुँचता है।

आओ, हम ऐसे भजन करने वाले बनें
जिनका जीवन स्वयं परमेश्वर की आराधना बन जाए।

भजन संहिता 2 अध्ययन हिंदी में | Psalm 2 Explained in Hindi | आओ हम उसके बंधन को डोड देते है

भजन संहिता 2 — पृष्ठभूमि और लेखक

भजन संहिता 2 दाऊद द्वारा लिखा गया भजन है। यह उस समय की परिस्थितियों को दर्शाता है जब राष्ट्र और राजा परमेश्वर की इच्छा के विरुद्ध चल रहे थे। यह मसीह के राज्य, उसके अधिकार और परमेश्वर की प्रभुता को प्रकट करता है। यह भजन चेतावनी और आशीष दोनों देता है।


2:1 जाति जाति के लोग क्यों हुल्लड़ मचाते हैं, और देश देश के लोग व्यर्थ बातें क्यों सोच रहे हैं?

अनुवाद: राष्ट्र क्यों विद्रोह कर रहे हैं और लोग व्यर्थ योजनाएँ क्यों बना रहे हैं?
व्याख्या: यह पद मानव जाति के घमंड को दिखाता है — लोग परमेश्वर की योजना के विरुद्ध जाकर अपनी शक्ति पर भरोसा करते हैं। उनकी सारी योजनाएँ व्यर्थ और टिकाऊ नहीं होतीं। दाऊद बता रहा है कि जो भी परमेश्वर के विरुद्ध खड़ा होता है, उसकी सोच खुद ही नाश का कारण बनती है।

2:2 यहोवा के और उसके अभिषिक्त के विरूद्ध पृथ्वी के राजा मिलकर, और हाकिम आपस में सम्मति करके कहते हैं, कि

अनुवाद: पृथ्वी के राजा और हाकिम परमेश्वर और उसके अभिषिक्त के विरुद्ध खड़े हो जाते हैं।
व्याख्या: यह पद दर्शाता है कि सांसारिक नेता मिलकर परमेश्वर की आज्ञा को चुनौती देते हैं। “अभिषिक्त” भविष्यद्वाणी रूप से मसीहा की ओर इशारा करता है। दुनिया की ताकतें हमेशा परमेश्वर की प्रभुता को नकारने की कोशिश करती हैं।

2:3 आओ, हम उनके बन्धन तोड़ डालें, और उनकी रस्सियों अपने ऊपर से उतार फेंके॥

अनुवाद: वे कहते हैं— हम परमेश्वर के नियमों को तोड़ डालें और उसके बन्धनों को हटाएँ।
व्याख्या: मनुष्य परमेश्वर के बंधन को बंधन नहीं बल्कि बोझ मानता है। वे आत्मिक स्वतंत्रता को गलत समझते हैं और परमेश्वर के अधिकार को हटाना चाहते हैं। यह विद्रोही मनुष्य के स्वभाव को दिखाता है।

2:4 वह जो स्वर्ग में विराजमान है, हंसेगा, प्रभु उन को ठट्ठों में उड़ाएगा।

अनुवाद: स्वर्ग में बैठा परमेश्वर उन पर हंसेगा और उनका उपहास करेगा।
व्याख्या: परमेश्वर की नजर में मनुष्य का विद्रोह हास्यास्पद है। परमेश्वर का शासन अटल है— कोई भी उसकी शक्ति को चुनौती नहीं दे सकता। विद्रोही योजनाएँ खुद ही टूटने के लिए बनी होती हैं।

2:5 तब वह उन से क्रोध करके बातें करेगा, और क्रोध में कहकर उन्हें घबरा देगा, कि

अनुवाद: परमेश्वर क्रोध में उनसे बात करेगा और उन्हें भयभीत करेगा।
व्याख्या: जब परमेश्वर न्याय करता है, तो कोई भी उसके सामने ठहर नहीं सकता। उसकी डांट शक्तिशाली है और विद्रोही राष्ट्रों को भय में डाल देती है।

2:6 मैं तो अपने ठहराए हुए राजा को अपने पवित्र पर्वत सिय्योन की राजगद्दी पर बैठा चुका हूं।

अनुवाद: परमेश्वर कहता है— मैंने अपने चुने हुए राजा को सिय्योन पर बैठाया है।
व्याख्या: परमेश्वर का राज्य स्थापित है। चाहे मनुष्य जितना विरोध करे, परमेश्वर का अभिषिक्त— मसीहा— ही सच्चा राजा है। उसका राज्य कभी नहीं हिलेगा।

2:7 मैं उस वचन का प्रचार करूंगा: जो यहोवा ने मुझ से कहा, तू मेरा पुत्रा है, आज तू मुझ से उत्पन्न हुआ।

अनुवाद: परमेश्वर ने कहा— तू मेरा पुत्र है, आज मैंने तुझे उत्पन्न किया।
व्याख्या: यह मसीह के दिव्य पुत्रत्व की घोषणा है। यह पद मसीहा की महिमा, अधिकार और स्वर्गीय पहचान को प्रकट करता है।

2:8 मुझ से मांग, और मैं जाति जाति के लोगों को तेरी सम्पत्ति होने के लिये, और दूर दूर के देशों को तेरी निज भूमि बनने के लिये दे दूंगा।

अनुवाद: मुझसे मांग— मैं सारी जातियों को तेरी विरासत बना दूंगा।
व्याख्या: परमेश्वर अपने पुत्र को संपूर्ण पृथ्वी की प्रभुता देता है। यह पद बताता है कि मसीह सिर्फ इस्राएल का नहीं बल्कि सारी दुनिया का राजा है।

2:9 तू उन्हें लोहे के डण्डे से टुकड़े टुकड़े करेगा। तू कुम्हार के बर्तन की नाईं उन्हें चकना चूर कर डालेगा॥

अनुवाद: तू उन्हें लोहे के डंडे से तोड़ेगा और बर्तनों की तरह चूर कर देगा।
व्याख्या: यह मसीह के न्यायी राजा होने को दर्शाता है। जो उसके विरुद्ध खड़े होंगे, न्याय के दिन ठहर नहीं सकेंगे।

2:10 इसलिये अब, हे राजाओं, बुद्धिमान बनो; हे पृथ्वी के न्यायियों, यह उपदेश ग्रहण करो।

अनुवाद: अब राजाओं, बुद्धिमान बनो; पृथ्वी के न्यायियों, शिक्षा लो।
व्याख्या: परमेश्वर सभी शक्तिशाली लोगों को चेतावनी देता है— अहंकार में मत रहो। परमेश्वर की प्रभुता को स्वीकार करना ही बुद्धिमानी है।

2:11 डरते हुए यहोवा की उपासना करो, और कांपते हुए मगन हो।

अनुवाद: डरते हुए यहोवा की उपासना करो और कांपते हुए आनन्दित हो।
व्याख्या: परमेश्वर की भय मानने वाली उपासना ही सच्ची उपासना है। आदर और विनम्रता के साथ आनन्द मनाना मसीही जीवन का आधार है।

2:12 पुत्र को चूमो ऐसा न हो कि वह क्रोध करे, और तुम मार्ग ही में नाश हो जाओ; क्योंकि क्षण भर में उसका क्रोध भड़कने को है॥ धन्य हैं वे जिनका भरोसा उस पर है॥

अनुवाद: पुत्र को आदर दो, ताकि वह क्रोध न करे और तुम नाश न हो जाओ। धन्य हैं वे जो उस पर भरोसा रखते हैं।
व्याख्या: यह अंतिम चेतावनी और आशीष है। जो मसीह को मानते हैं वे धन्य हैं, परन्तु जो उसे अस्वीकार करते हैं वे न्याय का सामना करते हैं। परमेश्वर पर भरोसा सुरक्षा और आशीष लाता है।

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