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Wednesday, 21 January 2026

परमेश्वर आत्मा है – आत्मा और सच्चाई से भजन करें | Powerful Christian Message in Hindi

आत्मा और सच्चाई से भजन करने वाले

📖 मुख्य वचन
“परमेश्वर आत्मा है, और अवश्य है कि उसके भजन करने वाले आत्मा और सच्चाई से भजन करें।”
(यूहन्ना 4:24)


🔹 1. परमेश्वर आत्मा है – उसकी पहचान और स्वभाव

व्याख्या:
यह वचन हमें परमेश्वर के स्वभाव को स्पष्ट रूप से समझाता है। परमेश्वर आत्मा है, अर्थात वह भौतिक सीमाओं में बंधा हुआ नहीं है। वह हर स्थान पर उपस्थित रहने वाला, सब कुछ जानने वाला और हर समय कार्य करने वाला प्रभु है। वह मनुष्य की बाहरी दशा को नहीं, बल्कि उसके भीतरी मन और आत्मा की स्थिति को देखता है।

जब हम यह समझते हैं कि परमेश्वर आत्मा है, तब हमारी आराधना का दृष्टिकोण बदल जाता है। तब हम केवल औपचारिकता या रीति से नहीं, बल्कि पूरे हृदय से परमेश्वर के सामने झुकते हैं। ऐसा भजन केवल शब्दों का उच्चारण नहीं, बल्कि आत्मा की गहराई से निकली हुई आराधना होती है।

📖 2 कुरिन्थियों 3:17
“प्रभु आत्मा है; और जहाँ प्रभु का आत्मा है वहाँ स्वतंत्रता है।”

📖 भजन संहिता 34:18
“यहोवा टूटे हुए मन वालों के निकट रहता है, और पिसे हुए मन वालों का उद्धार करता है।”


🔹 2. भजन का अर्थ – सम्पूर्ण जीवन का समर्पण

व्याख्या:
भजन केवल गीत गाने या शब्द बोलने तक सीमित नहीं है। बाइबल के अनुसार भजन का अर्थ है अपने पूरे जीवन को परमेश्वर के अधीन कर देना। जब मनुष्य अपने विचार, इच्छाएँ, योजनाएँ और मार्ग परमेश्वर को सौंप देता है, तब उसका जीवन स्वयं एक भजन बन जाता है।

परमेश्वर ऐसे भजन को स्वीकार करता है जो आज्ञाकारिता और नम्रता से भरा हो। यदि मनुष्य अपने जीवन में परमेश्वर की इच्छा को मानने से इनकार करता है, तो केवल शब्दों का भजन परमेश्वर को प्रसन्न नहीं करता।

📖 भजन संहिता 95:6
“आओ, हम झुककर दण्डवत करें; अपने कर्ता यहोवा के सम्मुख घुटने टेकें।”

📖 रोमियों 12:1
“अपने शरीरों को जीवित, पवित्र और परमेश्वर को भाता हुआ बलिदान करके चढ़ाओ; यही तुम्हारी आत्मिक सेवा है।”

📖 1 शमूएल 15:22
“आज्ञा मानना बलिदान से और कान लगाना मेढ़ों की चर्बी से कहीं अच्छा है।”


🔹 3. आत्मा से भजन करना – जीवित और सामर्थी आराधना

व्याख्या:
आत्मा से भजन करने का अर्थ है ऐसा भजन जो केवल बुद्धि या भावना तक सीमित न रहे, बल्कि परमेश्वर के आत्मा की अगुवाई में हो। जब मनुष्य आत्मा से भजन करता है, तब वह परमेश्वर के साथ गहरे संबंध में प्रवेश करता है।

ऐसा भजन बोझ नहीं लगता, बल्कि आत्मा को ताज़गी और शांति देता है। आत्मा से किया गया भजन मनुष्य के जीवन को बदलता है, उसे सामर्थ देता है और विश्वास में स्थिर करता है।

📖 रोमियों 8:26
“इसी रीति से आत्मा भी हमारी दुर्बलता में सहायता करता है।”

📖 इफिसियों 5:18-19
“आत्मा से परिपूर्ण होते जाओ; और भजन, स्तुति और आत्मिक गीत गाया करो।”

📖 गलातियों 5:25
“यदि हम आत्मा से जीवित हैं, तो आत्मा के अनुसार चलें भी।”


🔹 4. सच्चाई से भजन करना – वचन के अनुसार जीवन

व्याख्या:
सच्चाई से भजन करने का अर्थ है ऐसा जीवन जीना जो परमेश्वर के वचन के अनुसार हो। यदि हमारा जीवन वचन से अलग है और हमारा भजन अलग, तो वह भजन अधूरा रह जाता है। सच्चाई से भजन तब होता है जब हमारा आचरण, सोच और निर्णय परमेश्वर के वचन के अधीन होते हैं।

परमेश्वर का वचन सत्य है और वही मनुष्य के जीवन को पवित्र करता है। जब कोई व्यक्ति वचन में स्थिर रहता है, तब उसका भजन भी सच्चा और स्वीकार्य बनता है।

📖 यूहन्ना 17:17
“सच्चाई से उन्हें पवित्र कर; तेरा वचन सत्य है।”

📖 भजन संहिता 119:105
“तेरा वचन मेरे पांव के लिए दीपक और मेरे मार्ग के लिए उजियाला है।”

📖 भजन संहिता 119:160
“तेरे वचन का सार सत्य है।”


🔹 5. परमेश्वर की खोज – सच्चे भजन करने वालों के लिए

व्याख्या:
बाइबल यह स्पष्ट करती है कि परमेश्वर स्वयं ऐसे लोगों को खोजता है जो आत्मा और सच्चाई से भजन करें। वह केवल बाहरी भीड़ से प्रसन्न नहीं होता, बल्कि उन हृदयों को ढूंढ़ता है जो पूरी रीति से उसके प्रति समर्पित हों।

यह एक अद्भुत सच्चाई है कि सर्वशक्तिमान परमेश्वर मनुष्य के हृदय की खोज करता है, ताकि वह उसे सामर्थ और आशीष दे सके।

📖 यूहन्ना 4:23
“पिता ऐसे भजन करने वालों को ढूंढ़ता है जो आत्मा और सच्चाई से भजन करें।”

📖 2 इतिहास 16:9
“यहोवा की दृष्टि सारी पृथ्वी पर लगी रहती है कि जिनका मन उसकी ओर पूरा है, उन्हें वह सामर्थ दे।”


🔹 6. आज के समय के लिए आत्मिक सीख

व्याख्या:
आज के समय में यह वचन हमें आत्मिक जांच करने के लिए बुलाता है। क्या हमारा भजन केवल परंपरा बन गया है, या वह वास्तव में आत्मा और सच्चाई से निकल रहा है? परमेश्वर आज भी ऐसे भजन से प्रसन्न होता है जो टूटे और नम्र हृदय से किया गया हो।

📖 भजन संहिता 51:17
“टूटा हुआ और पिसा हुआ मन—ऐसा बलिदान परमेश्वर तुच्छ नहीं जानता।”

📖 यशायाह 29:13
“ये लोग मुँह से मेरा आदर करते हैं, पर उनका मन मुझ से दूर रहता है।”


🙏 समापन विचार

परमेश्वर आत्मा है।
वह हमारे शब्दों से अधिक हमारे हृदय को देखता है।
जब हम आत्मा और सच्चाई से भजन करते हैं,
तब हमारा भजन केवल सुनाई नहीं देता,
बल्कि परमेश्वर के सिंहासन तक पहुँचता है।

आओ, हम ऐसे भजन करने वाले बनें
जिनका जीवन स्वयं परमेश्वर की आराधना बन जाए।

Friday, 15 August 2025

इसराइल: बाइबल से आज तक — इतिहास वाचा और भविष्यवाणी | Israel: From the Bible to Today — History Covenant and Prophecy

इसराइल: बाइबल से आज तक — इतिहास, वाचा और भविष्यवाणियाँ

यह लेख इसराइल की बाइबलनिष्ठ यात्रा को शुरुआत से वर्तमान तक समझाता है—अबराहम की वाचा, मिस्र से उद्धार, राज्य-विभाजन, निर्वासन, वापसी, दूसरे मंदिर का काल, यीशु मसीह का आगमन, रोमी विनाश, 1948 की आधुनिक पुनर्स्थापना और अंत समय की भविष्यवाणियाँ—सब कुछ वचन-संदर्भों के साथ, ताकि आप इसे प्रचार/बाइबल अध्ययन में सीधे उपयोग कर सकें।


1) शुरुआत: अब्राहम की बुलाहट और भूमि-वाचा

उत्पत्ति 12:1–3 — “मैं तुझे एक बड़ी जाति बनाऊँगा… और तुझमें पृथ्वी के सब कुल आशीष पाएँगे।”

उत्पत्ति 15:18 — “उस दिन यहोवा ने अब्राम के साथ वाचा बंधाई…”

उत्पत्ति 17:7–8 — “यह वाचा सदा की वाचा ठहरेगी… कनान देश तुम्हारी सदा की संपत्ति होगा।”

अब्राहम → इसहाक (उत्प. 17:19) → याकूब (इसराइल, उत्प. 32:28) → 12 गोत्र (उत्प. 49). वाचा की तीन डोर—भूमि, वंश, आशीष—यही इसराइल की पहचान/बुलाहट का आधार है।

2) मिस्र से उद्धार, व्यवस्था और भूमि-प्रवेश

निर्गमन 3:7–10; 12 — फसह और उद्धार; परमेश्वर का छुड़ाना।

निर्गमन 19:5–6 — “याजकों का राज्य और पवित्र जाति।”

निर्गमन 20 — दस आज्ञाएँ; व्यवस्थाविवरण — राष्ट्र-जीवन की रूपरेखा।

यहोशू की अगुवाई में भूमि-प्रवेश (यहो. 1) और गोत्रों में बाँट। इस चरण में इसराइल एक वाचा-राष्ट्र के रूप में स्थापित होता है।

3) न्यायियों का चक्र, संयुक्त राजशाही और विभाजन

न्यायियों का दौर (अवज्ञा → दमन → पुकार → छुड़ाना; न्या. 2) के बाद संयुक्त राजशाही: शाऊल–दाऊद–सुलैमान (1 शमूएल–1 राजा). 2 शमूएल 7:12–16 में दाऊदी वाचा—“तेरा सिंहासन सदा”। बाद में राज्य विभाजन (1 राजा 12): उत्तर में इसराइल (समरिया), दक्षिण में यहूदा (यरूशलेम)।

4) पतन, निर्वासन और वापसी (दूसरा मंदिर)

2 राजा 17 — 722 ई.पू. उत्तरी राज्य का पतन (अश्शूर)।

2 राजा 25 — 586 ई.पू. यहूदा का पतन (बाबुल), मंदिर नष्ट।

यिर्मयाह 29:10–14 — 70 वर्षों के बाद वापसी की प्रतिज्ञा।

एज्रा 1 — कुस्रू (Cyrus) का फरमान; वापसी व मंदिर-निर्माण (516 ई.पू.).

नहेमायाह — यरूशलेम की दीवारें।

5) मसीहा का युग और रोमी विनाश

मीका 5:2 — बेतलेहेम से शासक। यशायाह 53 — दु:खी सेवक।

दानिय्येल 9:24–27 — समय-संकेत (कई व्याख्याएँ, मसीह की ओर संकेत माना जाता है)।

लूका 21:20–24 — यरूशलेम पर घेराव की चेतावनी; 70 ई. में विनाश (इतिहास)।

मसीह का क्रूस और पुनरुत्थान इतिहास का महान मोड़; उसके बाद व्यापक डायस्पोरा (बिखराव)।

6) बाइबल की प्रमुख भविष्यवाणियाँ (चयनित पाठ)

  • वापसी/इकट्ठा होना: व्यवस्थाविवरण 30:1–5; यिर्मयाह 31:8–10; आमोस 9:14–15
  • सूखी हड्डियाँ (पुनर्जीवन का चित्र): यहेजकेल 37:1–14
  • यरूशलेम केंद्र में: जकर्याह 12:2–3; 14 अध्याय
  • नई वाचा: यिर्मयाह 31:31–34
  • राष्ट्रों/समय की दृष्टि: रोमियों 11:25–27

इन पाठों की व्याख्या में मतभेद हो सकते हैं; पर मुख्य संदेश—परमेश्वर वाचा का विश्वासयोग्य है, और अन्तिम समाधान नई वाचा में है।

7) आधुनिक काल: 19वीं–20वीं सदी और पुनर्स्थापना

उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्द्ध में वापसी की धाराएँ; 1917 बैलफोर घोषणा; ब्रिटिश मैंडेट. 14 मई 1948—आधुनिक State of Israel की घोषणा; इसके बाद युद्ध/संघर्ष और विश्वभर से समुदायों का लौटना. कई मसीही इसे इकट्ठा किए जाने की भविष्यवाणियों (यहेज. 36–37; यिर्म. 31; आमोस 9) के साथ जोड़कर देखते हैं।

8) “अब तक” का रेखाचित्र (Genesis से वर्तमान)

  • अबराहम को वाचा: उत्प. 12; 15; 17
  • मूसा से उद्धार; यहोशू से भूमि-प्रवेश
  • दाऊद–सुलैमान; फिर विभाजन (1 राजा 12)
  • 722/586 ई.पू.: पतन/निर्वासन; फिर एज्रा–नहेम्याह द्वारा वापसी
  • 70 ई.: रोमी विनाश; दीर्घ डायस्पोरा
  • 1948: आधुनिक राज्य; 1967 के बाद के फेरबदल

9) प्रचार-बिंदु: वचन + लागू

यहेजकेल 36:24–28 — बाहरी पुनर्स्थापना + आंतरिक नवीनीकरण (“नया मन/नई आत्मा”).

यहेजकेल 37 — चरणबद्ध पुनर्जीवन: पहले जोड़, फिर श्वास।

जकर्याह 12–14 — यरूशलेम की वैश्विक संवेदनशीलता; प्रभु का हस्तक्षेप।

यिर्मयाह 31:31–34 — नई वाचा: हृदय पर व्यवस्था।

रोमियों 11 — विनम्रता, प्रार्थना, परमेश्वर की योजना पर भरोसा।

10) आज हमारे लिए क्या अर्थ?

  • प्रार्थना — शांति और उद्धार के लिए (भजन 122:6; 1 तीमु. 2:1–4).
  • वचन-केन्द्रित दृष्टि — खबरों को भविष्यवाणी-पाठों की रोशनी में समझें, पर सनसनी से दूर रहें (मत्ती 24:6).
  • आध्यात्मिक तैयारी — नई वाचा के अनुसार पश्चाताप, पवित्रता और मसीह में आशा।

निष्कर्ष

कथा का सूत्र एक ही है—परमेश्वर वाचा का ईमानदार है। अब्राहम की प्रतिज्ञा से लेकर निर्वासन और फिर वापसी तक, और आज की घटनाओं तक, बाइबल दिखाती है कि इतिहास संयोग नहीं—उद्धार-योजना का हिस्सा है। अंतिम समाधान नई वाचा और मसीह में है—जहाँ न्याय, शांति और अनन्त राज्य का वचन है (यिर्म. 31; जकर. 14; प्रकाशितवाक्य 21).

त्वरित संदर्भ सूची (Quick Scripture Index)

उत्प. 12; 15; 17; 32:28; 49 | निर्ग. 12; 19–20 | व्यव. 28–30 | यहो. 1 | 1–2 शमूएल; 1–2 राजा | यिर्म. 29; 31 | यहेज. 36–37 | दानि. 9 | जकर. 12–14 | लूका 21 | रोमि. 11 | भज. 122:6 | प्रकाशित. 21

Israel: From the Bible to Today — History, Covenant, and Prophecies

This article traces Israel’s biblical journey from its beginning to the present—the Abrahamic covenant, the Exodus from Egypt, the division of the kingdom, exile, return, the Second Temple era, the coming of Jesus Christ, the Roman destruction, the modern restoration in 1948, and end-time prophecies—all with scriptural references so you can use it directly for preaching or Bible study.


1) Beginning: Abraham’s Call and the Land Covenant

Genesis 12:1–3 — “I will make you into a great nation… and all peoples on earth will be blessed through you.”

Genesis 15:18 — “On that day the LORD made a covenant with Abram…”

Genesis 17:7–8 — “This covenant will be everlasting… Canaan will be your everlasting possession.”

Abraham → Isaac (Gen. 17:19) → Jacob (Israel, Gen. 32:28) → 12 tribes (Gen. 49). Three strands of the covenant—land, descendants, blessing—form the basis of Israel’s identity and calling.

2) Exodus, the Law, and Entry into the Land

Exodus 3:7–10; 12 — Passover and deliverance; God’s redemption.

Exodus 19:5–6 — “A kingdom of priests and a holy nation.”

Exodus 20 — The Ten Commandments; Deuteronomy — the national constitution.

Under Joshua’s leadership, Israel entered the land (Josh. 1) and divided it among the tribes. This stage established Israel as a covenant nation.

3) Judges, United Monarchy, and Division

The Judges period (disobedience → oppression → cry → deliverance; Judg. 2) was followed by the united monarchy: Saul–David–Solomon (1 Samuel–1 Kings). In 2 Samuel 7:12–16 God promised David, “Your throne will be established forever.” Later, the kingdom split (1 Kings 12): Israel (north, Samaria) and Judah (south, Jerusalem).

4) Decline, Exile, and Return (Second Temple)

2 Kings 17 — 722 BC: Northern kingdom falls (Assyria).

2 Kings 25 — 586 BC: Judah falls (Babylon), temple destroyed.

Jeremiah 29:10–14 — Promise of return after 70 years.

Ezra 1 — Cyrus’ decree; return and temple rebuilt (516 BC).

Nehemiah — Rebuilding Jerusalem’s walls.

5) Messianic Age and Roman Destruction

Micah 5:2 — Ruler from Bethlehem. Isaiah 53 — Suffering servant.

Daniel 9:24–27 — Prophetic timetable (often interpreted as pointing to Messiah).

Luke 21:20–24 — Warning of Jerusalem’s siege; fulfilled in AD 70.

The crucifixion and resurrection of Christ marked history’s turning point, followed by the great diaspora (scattering).

6) Key Biblical Prophecies

  • Return/Gathering: Deuteronomy 30:1–5; Jeremiah 31:8–10; Amos 9:14–15
  • Dry bones vision: Ezekiel 37:1–14
  • Jerusalem at the center: Zechariah 12:2–3; ch. 14
  • New Covenant: Jeremiah 31:31–34
  • Gentile time frame: Romans 11:25–27

Interpretations vary, but the main theme remains: God is faithful to His covenant, and the ultimate fulfillment is in the New Covenant.

7) Modern Era: 19th–20th Century and Restoration

In the late 19th century, waves of return began; 1917 Balfour Declaration; British Mandate. On May 14, 1948, the modern State of Israel was declared, followed by wars and waves of immigration. Many Christians connect this with the prophetic “gathering” (Ezek. 36–37; Jer. 31; Amos 9).

8) “So Far” — Timeline (Genesis to Today)

  • Abraham’s covenant: Gen. 12; 15; 17
  • Deliverance through Moses; land entry through Joshua
  • David–Solomon; then division (1 Kings 12)
  • 722/586 BC: Fall/exile; return under Ezra–Nehemiah
  • AD 70: Roman destruction; long diaspora
  • 1948: Modern state; post-1967 changes

9) Preaching Points: Word + Application

Ezekiel 36:24–28 — Outer restoration + inner renewal (“new heart, new spirit”).

Ezekiel 37 — Stages of revival: first sinews, then breath.

Zechariah 12–14 — Jerusalem’s global centrality; the Lord’s intervention.

Jeremiah 31:31–34 — New covenant written on the heart.

Romans 11 — Humility, prayer, trust in God’s plan.

10) What Does This Mean for Us Today?

  • Prayer — For peace and salvation (Psalm 122:6; 1 Tim. 2:1–4).
  • Scripture-centered view — Understand news in the light of prophecy, but avoid sensationalism (Matt. 24:6).
  • Spiritual readiness — Repentance, holiness, and hope in Christ under the New Covenant.

Conclusion

The thread running through history is one: God is faithful to His covenant. From Abraham’s promise to exile and return, up to today’s events, the Bible shows history is no accident—it’s part of the plan of redemption. The ultimate solution is in the New Covenant through Christ, where justice, peace, and an eternal kingdom are promised (Jer. 31; Zech. 14; Rev. 21).

Quick Scripture Index

Gen. 12; 15; 17; 32:28; 49 | Ex. 12; 19–20 | Deut. 28–30 | Josh. 1 | 1–2 Samuel; 1–2 Kings | Jer. 29; 31 | Ezek. 36–37 | Dan. 9 | Zech. 12–14 | Luke 21 | Rom. 11 | Ps. 122:6 | Rev. 21

Saturday, 17 May 2025

अय्यूब 3 अध्याय 1 से 26 तक का पूरा वचन और विस्तार से व्याख्या – हिंदी बाइबल स्टडी

अय्यूब अध्याय 3 - सम्पूर्ण बाइबल अध्ययन (हिंदी में)

अय्यूब अध्याय 3 - सम्पूर्ण वचन और व्याख्या (Job Chapter 3 in Hindi)

अय्यूब 3:1

इसके बाद अय्यूब ने अपना मुंह खोला, और अपने जन्म के दिन को कोसा।

व्याख्या: अय्यूब की पीड़ा इतनी बढ़ गई थी कि वह अपने ही जन्म को शाप देने लगा। यह उस गहरे मानसिक और आत्मिक संकट का प्रतीक है जिसमें मनुष्य अपनी उपस्थिति पर ही प्रश्न उठाने लगता है।

अय्यूब 3:2

और अय्यूब ने कहा,

व्याख्या: अब अय्यूब अपने दिल की गहराइयों से वह कहने को तैयार है जो उसके भीतर लंबे समय से दबा था। यह उसके दुःख की अभिव्यक्ति की शुरुआत है।

अय्यूब 3:3

क्या दिन था जिस दिन मैं उत्पन्न हुआ? और क्या रात थी जिस दिन कहा गया, "तू गर्भ में पड़ा है?"

व्याख्या: अय्यूब अब अपने जन्म पर प्रश्न उठाता है। वह चाहता है कि वह कभी न पैदा होता, क्योंकि उसके लिए यह जीवन बहुत दुःख और पीड़ा का कारण बन चुका है।

अय्यूब 3:4

वह दिन अंधकारमय हो, परमेश्वर से उपेक्षित हो, और ऊँचाई से कोई ज्योति न चमके।

व्याख्या: अय्यूब चाहता है कि वह दिन अंधकार में डूब जाए, जैसे वह कभी अस्तित्व में नहीं था। वह परमेश्वर से ही उपेक्षा का अनुभव कर रहा है।

अय्यूब 3:5

उस दिन अंधकार और घना अंधकार हो, उसे घेरने वाली घटाएँ उसे ढक लें, और उस पर भय के बवंडर उच्छल जाएं।

व्याख्या: अय्यूब चाहता है कि उस दिन पर सभी बुराइयाँ और घने अंधकार का राज हो, जिससे कोई प्रकाश न दिखाई दे। यह उसकी निराशा की पराकाष्ठा है।

अय्यूब 3:6

उस रात को काली रात समझा जाए, उसे उसमें कोई खुशी न हो, न ही वह किसी समय के दिनों में गणना में आए।

व्याख्या: वह रात और दिन दोनों के बीच खोया हुआ महसूस करता है। वह चाहता है कि वह रात कभी अस्तित्व में न आए, जैसे उसकी पीड़ा का कोई अंत न हो।

अय्यूब 3:7

उस रात को बियाबान की तरह हो, न उसमें कोई ध्वनि हो, न कोई आनंद का दिन आए।

व्याख्या: अय्यूब के लिए वह रात पूरी तरह निराशाजनक है, जिसमें न कोई आशा है, न कोई खुशहाली। वह बियाबान में अकेला और खोया हुआ महसूस करता है।

अय्यूब 3:8

जो समुद्र को जागृत करते हैं, और उसके गर्भ में हलचल मचाते हैं, क्या उन्हें शाप न दिया जाए?

व्याख्या: अय्यूब समुद्र के उथल-पुथल को एक उपमा के रूप में प्रस्तुत करता है, वह चाहता है कि जैसे समुद्र में हलचल मचाने वाले शापित होते हैं, वैसे ही उसके जन्म के दिन को भी शापित किया जाए।

अय्यूब 3:9

उस दिन के तारे अंधकारमय हो जाएं, और वे परमेश्वर के प्रकाश का आलंबन न बनें।

व्याख्या: अय्यूब चाहता है कि उस दिन का हर रूप अंधकार में डूब जाए, जिसमें कोई आशा या प्रकाश न दिखाई दे।

अय्यूब 3:10

क्योंकि वह मेरे जन्म को नित्य कुपित करता है, और मुझे निरर्थक जन्म देने के लिए परमेश्वर ने मेरी स्त्री के गर्भ में मुझे स्थान दिया।

व्याख्या: अय्यूब अपने जन्म को निरर्थक मानता है, और यह महसूस करता है कि परमेश्वर ने उसे जन्म देने में कोई उद्देश्य नहीं रखा।

अय्यूब 3:11

क्यों मैं मरकर जन्मा नहीं, या मेरे मुँह से ही मृत्यु क्यों नहीं आई?

व्याख्या: अय्यूब मौत की कामना करता है, वह मानता है कि मृत्यु उसे शांति दे सकती है।

अय्यूब 3:12

क्या जब मैं पैदा हुआ था, मेरी माँ ने मुझे क्यों रखा? या मेरे पिताजी ने मुझे क्यों अपनाया?

व्याख्या: अय्यूब अपने माता-पिता से सवाल करता है कि क्यों उन्हें जन्म दिया, जबकि वह जीवन में इतनी पीड़ा सह रहा है।

अय्यूब 3:13

यदि मैं मर जाता, तो विश्राम प्राप्त करता, और शांति पाता,

व्याख्या: अय्यूब मृत्यु को विश्राम और शांति का स्रोत मानता है। वह अब जीने की तुलना में मरने को बेहतर मानता है।

अय्यूब 3:14

जो लोग दुष्ट थे, वे वहाँ विश्राम करते हैं; और वहाँ रक्षक और नियंत्रक नहीं होते।

व्याख्या: अय्यूब यह मानता है कि मृत्यु में सभी भेद मिट जाते हैं, चाहे व्यक्ति दुष्ट हो या नहीं।

अय्यूब 3:15

मैं तो वहाँ राजा और प्रधानों के साथ रहता, जो सोने का महल बनाते थे, और चांदी के घर में रहते थे।

व्याख्या: वह मृत्यु को एक ऐसा स्थान मानता है, जहाँ सभी समान होते हैं, और यहाँ तक कि राजा और गरीब भी एक जैसे रहते हैं।

अय्यूब 3:16

क्योंकि वहाँ गरीब और उधारकर्ता समान हैं, और दास मुक्त हो जाता है अपने मालिक से।

व्याख्या: मृत्यु में सामाजिक भेदभाव समाप्त हो जाता है। गरीब और उधारकर्ता, दास और मालिक सभी समान हो जाते हैं। यह मनुष्य के जीवन की अस्थायी सत्ता की याद दिलाता है।

अय्यूब 3:17

वहाँ पथभ्रष्ट और पथहीन लोग एक साथ विश्राम करते हैं।

व्याख्या: मृत्यु में हर प्रकार के लोग, चाहे वे सही मार्ग पर हों या भटक गए हों, सबको समान विश्राम मिलता है। यह मृत्यु की समानता दर्शाता है।

अय्यूब 3:18

जहाँ चीर और अँधकार है, और जहाँ प्रकाश है अंधकार से छुटकारा नहीं पाता।

व्याख्या: यहाँ अय्यूब मृत्यु के उस रहस्य को व्यक्त करता है जहाँ ना तो पूरी तरह उजाला है और ना अंधकार। यह उस अवस्था की व्याख्या है जहाँ जीवन के परिचित अनुभव समाप्त हो जाते हैं।

अय्यूब 3:19

वहाँ घोड़े और उसके सवार दोनों एक साथ रहते हैं।

व्याख्या: मृत्यु सभी वर्गों और पदों के बीच भेद मिटा देती है — चाहे वह घोड़ा हो या उसका सवार, दोनों को समान अवस्था में रखा जाता है।

अय्यूब 3:20

जहाँ दुष्ट और निर्मल दोनों हैं, और जहां दुष्ट और जो दूसरों को घायल करते हैं, एक साथ रहते हैं।

व्याख्या: यहाँ भी मृत्यु के समानता के सिद्धांत को दोहराया गया है जहाँ सभी, चाहे वे अच्छे हों या बुरे, एक समान रूप से विश्राम करते हैं।

अय्यूब 3:21

मैं सोचता हूँ, और मेरा मन कहता है,

व्याख्या: अय्यूब अपने भीतर गहरे विचारों में डूब जाता है और अपने मन की बात सुनता है, जो उसे मृत्युपरक विचारों की ओर ले जाता है।

अय्यूब 3:22

क्योंकि मृत्यु से बचा हुआ व्यक्ति है? मृत्यु की घाटी से कौन लौटता है?

व्याख्या: अय्यूब यह प्रश्न पूछता है कि मृत्यु से कोई वापस नहीं आता, जो जीवन के अस्थायी और नश्वर स्वभाव को दर्शाता है।

अय्यूब 3:23

मैं तो यहूदी का जीवन मार्ग देखता हूँ, और रात और दिन के बीच घूमता रहता हूँ।

व्याख्या: अय्यूब जीवन की निरंतर संघर्षमय स्थिति को दर्शाता है, जहाँ वह जीवन के मार्ग पर दिन-रात यात्रा करता है, परंतु शांति नहीं पाता।

अय्यूब 3:24

जब मैं कहता हूँ, मेरी शक्ति है, और मेरी आत्मा परमेश्वर की कृपा से जीवित है;

व्याख्या: यहाँ अय्यूब जीवन में बची हुई अपनी ताकत और परमेश्वर की कृपा को महसूस करता है, जो उसे जीने की हिम्मत देती है।

अय्यूब 3:25

तो मैं अपने दुखों से घबरा जाता हूँ, और याद करता हूँ कि मैं कैसे उसके सामने गया।

व्याख्या: अय्यूब अपनी पीड़ा में भयभीत होता है, लेकिन परमेश्वर के सामने आने की याद उसे संतोष भी देती है।

अय्यूब 3:26

जहाँ भी मैं चलता हूँ, मुझे अपनी ओर उसकी दृष्टि प्राप्त होती है।

व्याख्या: अय्यूब यह स्वीकार करता है कि परमेश्वर उसकी हर गतिविधि पर नज़र रखते हैं, चाहे वह कहीं भी हो। यह परमेश्वर की सर्वव्यापकता और देखभाल का संकेत है।

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