💝 दशमांश, दान और भेंट पर बाइबल आधारित सम्पूर्ण अध्ययन
📖 परिचय
दशमांश, दान और भेंट पवित्रशास्त्र के महत्वपूर्ण विषय हैं। बहुत से विश्वासियों के मन में प्रश्न होते हैं कि क्या दशमांश आज भी आवश्यक है, दान और भेंट में क्या अंतर है, और नया नियम इन विषयों के बारे में क्या सिखाता है।
इस अध्ययन में हम पहले नया नियम और उसके बाद पुराने नियम के वचनों को देखेंगे ताकि सम्पूर्ण पवित्रशास्त्र की शिक्षा को समझ सकें।
देना केवल आर्थिक विषय नहीं है, बल्कि यह विश्वास, कृतज्ञता, प्रेम, आराधना और समर्पण का विषय है।
✝️ नया नियम क्या सिखाता है?
नया नियम विश्वासियों को बाध्यता या भय से नहीं, बल्कि प्रेम, प्रसन्नता और विश्वास से देने की शिक्षा देता है।
❤️ प्रसन्नता से देने वाला
📖 2 कुरिन्थियों 9:7
"हर एक जन जैसा अपने मन में ठाने वैसा ही दान करे; न कुढ़-कुढ़ के और न दबाव से, क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।"
प्रेरित पौलुस विश्वासियों को बताते हैं कि परमेश्वर बाहरी मजबूरी नहीं बल्कि हृदय की इच्छा को देखता है।
यदि कोई व्यक्ति केवल दबाव, भय या लोगों को दिखाने के लिए देता है, तो वह बाइबल की शिक्षा के अनुसार देना नहीं है।
परमेश्वर उस व्यक्ति से प्रसन्न होता है जो प्रेम, कृतज्ञता और आनन्द के साथ देता है।
🌾 उदारता से बोने वाला
📖 2 कुरिन्थियों 9:6
"जो थोड़ा बोता है वह थोड़ा काटेगा, और जो बहुत बोता है वह बहुत काटेगा।"
पौलुस यहाँ खेती का उदाहरण देकर बताते हैं कि उदारता और कृपणता दोनों के परिणाम होते हैं।
इस वचन का अर्थ केवल धन की वृद्धि नहीं है, बल्कि परमेश्वर की आशीष, आत्मिक फल और सेवकाई के विस्तार से भी है।
विश्वासी को अपनी सामर्थ्य और विश्वास के अनुसार उदार होना चाहिए।
🤲 गुप्त रूप से दान देना
📖 मत्ती 6:3-4
"जब तू दान करे, तो जो तेरा दाहिना हाथ करता है उसे तेरा बाँया हाथ भी न जानने पाए।"
प्रभु यीशु ने दान को दिखावे और प्रशंसा प्राप्त करने का साधन बनने से रोका।
दान का उद्देश्य मनुष्यों से सम्मान प्राप्त करना नहीं, बल्कि परमेश्वर की महिमा करना है।
जो कुछ हम परमेश्वर के लिए करते हैं, वह सच्चे और नम्र हृदय से होना चाहिए।
💝 लेने से देना अधिक धन्य है
📖 प्रेरितों के काम 20:35
"लेने से देना अधिक धन्य है।"
प्रभु यीशु की यह शिक्षा मसीही जीवन के सबसे सुन्दर सिद्धांतों में से एक है।
दुनिया प्राप्त करने में आनन्द खोजती है, लेकिन प्रभु यीशु देने में आनन्द और आशीष देखते हैं।
जब विश्वासी प्रेम से देता है, तब वह परमेश्वर के स्वभाव को प्रकट करता है क्योंकि परमेश्वर स्वयं देने वाला परमेश्वर है।
🪙 निर्धन विधवा की भेंट
📖 मरकुस 12:41-44
प्रभु यीशु ने कहा कि इस निर्धन विधवा ने सब से अधिक डाला है, क्योंकि दूसरों ने अपनी बहुतायत में से दिया, परन्तु उसने अपनी घटी में से अपना सब कुछ दे दिया।
प्रभु यीशु केवल दी गई राशि को नहीं देखते, बल्कि उस हृदय को देखते हैं जिससे वह दी जाती है।
बहुत लोग अधिक देकर भी परमेश्वर को प्रसन्न नहीं कर पाते, जबकि कोई व्यक्ति थोड़ी भेंट देकर भी परमेश्वर को प्रसन्न कर सकता है यदि उसका हृदय विश्वास और प्रेम से भरा हो।
इस घटना से यह शिक्षा मिलती है कि परमेश्वर के सामने मात्रा से अधिक महत्व समर्पण और विश्वास का है।
🤝 प्रारम्भिक कलीसिया की उदारता
📖 प्रेरितों के काम 4:34-35
उनमें कोई भी दरिद्र न था, क्योंकि जिनके पास भूमि या घर थे वे उन्हें बेचकर उसका मूल्य प्रेरितों के पास रखते थे और प्रत्येक को उसकी आवश्यकता के अनुसार बाँट दिया जाता था।
प्रारम्भिक कलीसिया प्रेम, सहभागिता और उदारता का अद्भुत उदाहरण थी।
विश्वासी केवल अपनी आवश्यकताओं के बारे में नहीं सोचते थे, बल्कि दूसरों की आवश्यकताओं को भी अपनी जिम्मेदारी मानते थे।
यह दान मजबूरी से नहीं बल्कि प्रेम और एकता के कारण था।
📜 पुराने नियम में दशमांश
अब हम देखते हैं कि पुराने नियम में दशमांश की व्यवस्था किस प्रकार दी गई थी और उसका उद्देश्य क्या था।
👑 अब्राहम और दशमांश
📖 उत्पत्ति 14:19-20
अब्राम ने सब वस्तुओं में से मलिकिसिदक को दशमांश दिया।
यह बाइबल में दशमांश का पहला उल्लेख है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि यह घटना मूसा की व्यवस्था दिए जाने से पहले हुई थी।
अब्राहम ने किसी मजबूरी या आदेश के कारण नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रति आदर और धन्यवाद के कारण दशमांश दिया।
🏕️ याकूब की प्रतिज्ञा
📖 उत्पत्ति 28:20-22
याकूब ने प्रतिज्ञा की कि जो कुछ परमेश्वर उसे देगा उसका दशमांश वह परमेश्वर को देगा।
याकूब ने दशमांश को परमेश्वर की विश्वासयोग्यता और सुरक्षा के उत्तर के रूप में देखा।
यह कृतज्ञता और समर्पण का एक कार्य था।
दशमांश केवल आर्थिक व्यवस्था नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रति सम्मान और विश्वास का प्रतीक भी था।
🌾 दशमांश यहोवा का है
📖 लैव्यव्यवस्था 27:30
"भूमि का सब दशमांश चाहे भूमि के बीज का हो या वृक्ष के फल का, वह यहोवा का है; वह यहोवा के लिये पवित्र है।"
पुराने नियम में परमेश्वर ने इस्राएल की प्रजा को सिखाया कि उनकी सम्पत्ति, उपज और आशीष का वास्तविक स्वामी परमेश्वर है।
दशमांश इस बात की स्वीकृति था कि जो कुछ मनुष्य के पास है वह अन्ततः परमेश्वर की ओर से प्राप्त हुआ है।
इस प्रकार दशमांश केवल आर्थिक योगदान नहीं था, बल्कि परमेश्वर की प्रभुता को स्वीकार करने का एक कार्य था।
⛺ सेवकाई के समर्थन के लिए दशमांश
📖 गिनती 18:21
"लेवियों को मैं ने इस्राएल में सब दशमांश उनके भाग के लिये दिया है, क्योंकि वे मिलापवाले तम्बू की सेवा करते हैं।"
पुराने नियम में लेवी गोत्र को अन्य गोत्रों की तरह भूमि का भाग नहीं मिला था।
उनकी जिम्मेदारी परमेश्वर की सेवा और आराधना से सम्बन्धित कार्यों को पूरा करना था।
इसी कारण परमेश्वर ने दशमांश की व्यवस्था के द्वारा उनकी आवश्यकताओं की पूर्ति का प्रबंध किया।
इससे यह सिद्धान्त दिखाई देता है कि परमेश्वर की सेवकाई और आराधना के कार्यों का समर्थन करना महत्वपूर्ण है।
🌿 प्रथम फल द्वारा परमेश्वर का आदर
📖 नीतिवचन 3:9
"अपनी सम्पत्ति और अपनी सारी उपज के पहिले फल से यहोवा का आदर कर।"
बाइबल सिखाती है कि परमेश्वर को हमारे जीवन में पहला स्थान मिलना चाहिए।
पहले फल का सिद्धान्त यह दर्शाता है कि मनुष्य अपनी सर्वोत्तम वस्तुओं के द्वारा परमेश्वर का आदर करे।
यह केवल धन तक सीमित नहीं है, बल्कि समय, प्रतिभा, सेवा और जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में परमेश्वर को प्रथम स्थान देने की शिक्षा देता है।
📦 भण्डार में दशमांश लाना
📖 मलाकी 3:10
"सब दशमांश भण्डार में ले आओ, कि मेरे भवन में भोजनवस्तु रहे।"
यह वचन पुराने नियम में इस्राएल की प्रजा के लिए दिया गया था।
इसका उद्देश्य आराधना, सेवकाई और परमेश्वर के भवन से जुड़े कार्यों का समर्थन करना था।
इस वचन का ऐतिहासिक और बाइबिलीय संदर्भ समझना महत्वपूर्ण है, ताकि इसे सही प्रकार से समझा जा सके।
💝 दान, भेंट और दशमांश में अंतर
दशमांश — आय या उपज का दसवाँ भाग, जिसका उल्लेख विशेष रूप से पुराने नियम में मिलता है।
दान — गरीबों, जरूरतमंदों और सहायता की आवश्यकता रखने वालों के लिए प्रेम और दया से दिया गया योगदान।
भेंट — परमेश्वर के प्रति आदर, धन्यवाद और आराधना के रूप में स्वेच्छा से दिया गया समर्पण।
❤️ परमेश्वर किस प्रकार के दाता को पसंद करता है?
पवित्रशास्त्र बार-बार यह सिखाता है कि परमेश्वर केवल भेंट या दान की मात्रा को नहीं देखते, बल्कि उस हृदय को देखते हैं जिससे वह दिया जाता है।
मनुष्य बाहरी वस्तुओं को देखता है, परन्तु परमेश्वर हृदय को देखते हैं।
इसलिए देना केवल आर्थिक विषय नहीं है, बल्कि यह आराधना, विश्वास और प्रेम का विषय है।
😊 प्रसन्नता से देने वाला
📖 2 कुरिन्थियों 9:7
"क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।"
परमेश्वर मजबूरी, दबाव या भय के कारण दी गई भेंट से अधिक उस भेंट को महत्व देते हैं जो प्रेम और प्रसन्नता से दी जाती है।
हर्ष से देना परमेश्वर की भलाई और विश्वासयोग्यता पर भरोसा प्रकट करता है।
🙏 विश्वास के साथ देने वाला
जब कोई विश्वासी परमेश्वर पर भरोसा करते हुए देता है, तब वह यह स्वीकार करता है कि उसकी आवश्यकताओं की पूर्ति का वास्तविक स्रोत परमेश्वर ही है।
देना विश्वास का एक कार्य भी है, क्योंकि इसके द्वारा मनुष्य यह प्रकट करता है कि उसका भरोसा अपनी सम्पत्ति पर नहीं बल्कि परमेश्वर पर है।
🤝 प्रेम और दया से देने वाला
दान और सहायता का उद्देश्य केवल आर्थिक सहयोग नहीं, बल्कि परमेश्वर के प्रेम को लोगों तक पहुँचाना भी है।
जब विश्वासी जरूरतमंदों की सहायता करते हैं, तब वे परमेश्वर के प्रेम और करुणा को प्रकट करते हैं।
यही कारण है कि प्रारम्भिक कलीसिया में विश्वासी एक-दूसरे की आवश्यकताओं को पूरा करने में तत्पर रहते थे।
📖 निष्कर्ष
पवित्र बाइबल सिखाती है कि दशमांश, दान और भेंट केवल धन से जुड़े विषय नहीं हैं, बल्कि यह विश्वास, कृतज्ञता, आराधना और समर्पण से जुड़े हुए विषय हैं।
नया नियम प्रेम, प्रसन्नता और स्वेच्छा से देने पर बल देता है, जबकि पुराने नियम में दशमांश और सेवकाई के समर्थन की व्यवस्था दिखाई देती है।
विश्वासी को बुद्धिमानी, प्रेम और विश्वास के साथ देना चाहिए, क्योंकि परमेश्वर केवल भेंट को नहीं, बल्कि उस हृदय को देखते हैं जिससे वह दी जाती है।
📚 मुख्य बाइबल संदर्भ
📖 मत्ती 6:3-4
📖 मरकुस 12:41-44
📖 प्रेरितों के काम 20:35
📖 प्रेरितों के काम 4:34-35
📖 उत्पत्ति 14:19-20
📖 उत्पत्ति 28:20-22
📖 लैव्यव्यवस्था 27:30
📖 गिनती 18:21
📖 नीतिवचन 3:9
📖 मलाकी 3:10
💝 "क्योंकि परमेश्वर हर्ष से देने वाले से प्रेम रखता है।"
— 2 कुरिन्थियों 9:7 —
देना केवल आर्थिक कार्य नहीं है।
यह विश्वास है।
यह आराधना है।
यह कृतज्ञता है।
यह प्रेम का प्रकट होना है।
